Thursday, August 27, 2009

हा मैंने उसे छुआ है..


चलो पिकनिक जाते है ..किसी ने कहा..एक ने दुसरे से और दुसरे ने तीसरेसे पूछा .. वो आ रही है ? अरे हां मुझे पूछ रही थी कब जाना है.. चलो फिर मै भी आता हु .. मेरी माँ शायद न भेजे ..किसीने कहा तो हमने उसे बिना बताये आने की सलाह भी दे डाली.. दो तीन दिनोमे २० -२२ दोस्त जमा हो गए .. अपना अपना खर्चा.. नो contribution.. लेकिन जायेंगे कहा.. वसई के नजदीक
chinchoti जाते है .. बारिश के दिनों में वहा एक सॉलिड waterfall होता है .. मै दो बार जा चूका हु, और आना जाना भी आसन है .. किसी ने कहा..लेकिन सुबह निकलेंगे ६ बजे और शाम को वापस नहीं तो मेरा बाप डाटेगा .. ओके .. चलो फिर done ..
आज तक़रीबन १५ साल हुए इस बात को | मै तभी मिठीबाई कॉलेज में पढता था | वक़्त मिले अगर नाटक में से तो पढाई भी होती थी..| प्रिंसिपल की लड़की मुझे राखी बांधती थी तो
फेल होने का कोई डर नहीं था | हमारा एक ही ऐसा कॉलेज था जो नाटक वालोंको खर्चे के लिए पैसे देता था | सभी छोटी मोटी जरूरतें उसी पैसोंसे चलती थी | घरसे पैसे माँगना..उसके लिए जायज कारन देना जरूरी नहीं था | अमीर लड़कोंका और मेरा हमेशा का साथ रहा है..हलाकि मै कुछ ज्यादा अमीर नहीं था लेकिन किसी चीज़ की कमी भी कभी महसूस नहीं हुई | मेरी आदते भी कुछ अमीर लड़कों जैसी ही थी ..कॉलेज में ना बैठना, पढाई कम और लड़किया ज्यादा देखना, किसी की टांग खींचना, तेज़ मोटर साइकिल चलाना और सबको डराना, डर नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं दिल में ..बस मजे करो .. अमीर लड़कोंके साथ खड़े होनेसे लड़किया मुझे भी अमीर समझती और बाते करती.. अमीर लड़किया मुझे तभी सुन्दर भी लगती थी.. ऐसी कई लड़किया उस पिकनिक में शामिल होने जा रही थी.. और क्या चाहिए दोस्तों..
जेब में पैसोंका अंदाजा लिया और मैंने भी पिकनिक को हां कह डाली | अगले सन्डे chinchoti
सुबह जल्दी उठा ..मुझे देर न हो जाये इसलिए माँ ने बनाया नाश्ता बिना किये ही भाग गया घरसे..ट्रेन पकडके सीधे वसई ..संभलके रहना ऐसा कुछ शायद पीछे से कहा था माँ ने ...
हसी मजाक तो शुरू था ही.... कल का पता नहीं लेकिन आज वो मेरे साथ चल रही थी .. उसका बॉय फ्रेंड नहीं आ पाया था पिकनिक को.. मुझे इस चीज़ का अंदाजा था वैसे.. मेरे कुछ दोस्त अब मेरी ही खिंच रहे थे ..
वैसे १ घंटा चलना पड़ता है बस से उतरने के बाद.. गाव का रास्ता है ..उपरसे बारिश.. कच्चा रास्ता है तो पैर भी फिसलता है कभी कभी.. तुम अगर लड़की हो तो ज्यादा ही फिसलता है.. लेकिन हम थे ना संभालने के लिए | कुछ लड़कियोंको तो हाथ पकडके चलने की आदत होती है ..आमिर लड़किया खुद के पैरोंसे कम और लड़कोंसे सहारा लेकर ही चल सकती है ऐसे रास्तों पर .. आदत जो नहीं होती उन्हें..खैर ..
सामने वो मशहूर waterfall देखकर सब खुश हुए.. पहाड़ के उपरसे पानी आ रहा था ..मैंने देखा की उपरसे आने वाला पानी निचे आने से पहले ऊपर की तरफ और दो सतह पर रुकता था और बहते हुआ सबसे नीचे आता था .. मेरे कुछ दोस्तोने तो ऊपर की तरफ जाने का मन बना ही लिया था...लेकिन मुझे तो तैरना आता ही नहीं था.. इसलिए मैंने अपनी जगह सबसे नीचे तय कर ली थी.. बियर तो मै तब भी नहीं पिता था तो बाकी लड़कोंको छोड़कर कपडे बदलकर सीधे पानी में घुस गया.. ठंडा पानी ..उफ्फ्फ ..जन्नत. और ये क्या वो रवीना टंडन जैसी लड़की मेरी तरफ ही आ रही है.. वा वाह .. और जन्नत.. वो मेरे ग्रुप की नहीं थी तो वो थोडी दूर ही रही ..खैर .. थोडी ही देर में मेरे सभी दोस्त आजू बाजू में दिखने लगे. किसीने म्यूजिक भी जोर से लगा दिया था.. सब नाच रहे थे.. भीगी हुई लड़कियोंका नाच हम सब बड़े मजे से देख रहे थे..
मेरे कुछ दोस्त और वो लड़की जो मेरे साथ चलती हुई आयी थी पुरे रास्ते.. मैंने देखा के उपरकी तरफ जा रहे है.. मैंने उन्हें हाथ भी दिखाया .. तो उन्होंने मुझे ऊपर आने का इशारा किया.. मैंने भी सोचा चलो यार चलते है ऊपर,,यहाँ क्या रखा है..और चल पड़ा..
ऊपर भीड़ कम थी .. पानी भी नीला दिखाई दे रहा था और शांत भी. मेरे ३ दोस्त उसी पानी में तैर रहे थे और वो लड़की भी कमर तक पानी में तैर रही थी.. मै भी चल पड़ा .. उस लड़की तक पहुँच के वहा तैरने की कोशिश कर रहा था..अब उसे भी तो पता नहीं चले के मै तैर नहीं सकता....इतने में मेरा एक दोस्त जिसका नाम मुझे आज भी याद है .. दीपन.. अन्दर से चिल्लाया .. अरे शशांक वहा क्या कर रहे हो यहाँ आ जाओ .. तैर नहीं सकते क्या.. मैंने कहा तैर तो रहा हु ..रुको मै तुम्हे अन्दर ले चलता हु.. यहाँ आओ.. पानी ज्यादा गहरा नहीं है.. मै जहा खडा था वहा से शायद मैने एकही कदम आगे बढाया और...
अब मै पानी के नीचे था.. उपरसे गिरने वाले पानी ने वहा एक बढासा गड्ढा बना दिया था जिसमे शायद मै फस चूका था...उपरसे बड़ी तेजी से गिरने वाला पानी और नीचे गड्ढा.. बहार आने का कोई चांस ही नहीं.. जब तक सांस थी मै हर संभव कोशिश कर रहा था बाहर आने की लेकिन नहीं.. ताकद ख़त्म हो रही थी.. हो चुकी थी.. कोई मदत के लिए नहीं था.. मुझे सिर्फ नीला पानी दिख रहा था.. खून शायद आंखोमे आ चूका था. मेरी आँखे बंद हो रही थी.. लेकिन अभी तक बेहोश नहीं हुआ था मै.. हर तरह से कोशिश की थी मैंने तैरने की ..जो भी सुना था ..जैसे भी देखा था ..लेकिन नहीं.. और मेरी ताकद पूरी ख़त्म हुई अब मैंने अपने आप को छोड़ दिया..मेरा पेट पानी से पूरा फूल सा गया था .. अभीभी मै बेहोश नहीं था..होश में था.. पानी के नीचे था.. मर कैसे सकता हु मै.. इतनी लम्बी लाइफ लाइन जो है हाथ पर.. अब फायर ब्रिगेड आयेगी.. अब मै डेड बॉडी बन जाऊंगा ..संभल के रहना माँ ने कहा था.. अब उसपे क्या बीतेगी..क्या करू मै..कुछ नहीं कर पा रहा हु.. अब तो आँखे भी बंद हो चुकी थी मेरी ..उन्हें खोलने की भी ताकद नहीं थी मुझमे.. अपने आप को छोड़ दिया था मैंने.. मुझे जोरसे रोना था , चिल्लाना था, हर भगवान् को याद किया मैंने ..उस वक़्त शशांक मौत से डर गया था शायद .. अरे कोई तो मदत करो यार ..
अजीब चीज है ये पानी जो जिन्दा आदमी को डुबोता है और मरने पर उसे ऊपर लता है.. पानी से बहता हुआ मै शायद आगे आ गया और मेरे पैरो के नीचे एक पत्थर सा आ गया . न जाने कहा से वो ताकद आयी मुझमे .. उस पत्थर पे जोर डालके मै ऊपर आया.. आधी सांस ली और फिर नीचे चला गया.. उस आधी सांस ने ये कहा मुझसे के छोड़ दो अपने आपको पानी के हवाले ..अपने आप बाहर आओगे.. मैंने वाही किया ..पता नहीं कितना वक़्त बीता था ..पानी ने भी सोचा होगा चलो अब इसमें कोई जान नहीं बची .. तो लाते है इसे बाहर.. ( शायद किसी की दुआ थी ) .. लेकिन कुछ ही पल में मेरे पेट के नीचे एक बड़ा सा पत्थर आ गया ..और मै पानी के बाहर आ गया.. उस पत्थर पे मै लेटा था आँखे खोलने की ताकद नहीं थी लेकिन पानी के बहार होने का और जान बचने का एहसास क्या बताऊ आपको दोस्तों..जन्नत.
थोडी ही देर में मुझमे शक्ति आयी ..और मैंने आँखे खोल दी...
सिर्फ पानी की आवाज़ . मै उस बिच वाले पत्थर पे अटका हुआ था...मेरे दोनों बाजुसे जोर से बहता हुआ पानी निचे जा रहा था
.. अगर नीचे से कोई देखता तो मुझे पागल कहता.. २५० फ़ुट नीचे तो सब मजे कर रहे थे .. बचाना ये हसीनो लो मै आ गया पे नाच रहे थे .. किसीका भी ध्यान मेरी तरफ नहीं था.. कोई सोच भी कैसे सकता है के कोई वहा जायेगा जहा दोनों तरफ मौत है..जान जाये पर पत्थर न जाये इस हालत में मै वहा चिपक के बैठा था.. सोच रहा था के अब कौन होगा जिसे मेरी याद आयेगी? वो जिसे मैंने सहारा दिया था पुरे रास्ते में उसे या वो जो मेरे अमीर दोस्त थे उन्हें .. काफी वक़्त बीता था वहा लेकिन रास्ता नहीं दिख रहा था .. वहा तैरने के लिए कोई आ भी नहीं रहा था.. कौन मरने आएगा सभी लड़कियोंको छोडके २५० फ़ुट ऊपर .. खैर.. मुझे ही कुछ करना होगा ..मैंने पत्थर को बिना छोडे हिलने की कोशिश की लेकिन पानी की धारा बड़ी तेज थी .. पाव फिसल रहा था.. और मै फिर उस हालत में जाना नहीं चाहता था जहा शायद सिर्फ मौत रहती है ..यहाँ कमसे कम मै जिन्दा था..
कुछ देर बाद मुझे किसीके हसने की आवाज आई .. मैंने देखा तो दीपन निचे की तरफ जा रहा था जो अब तक सबसे उपरी सतह पर था..वो भी थी उसके साथ.. खैर .. वो ज्यादा important नहीं .. वो तो इस तरफ देख ही नहीं रहा था.. एक बार मुझे यहाँ से निकाल तो सही फिर देखता हु तुम्हे... पानी की आवाज में मेरी मामूली आवाज उस तक जाने का कोई चांस ही नहीं था ..मैंने एक हाथ हिलाना शुरू किया.. दुसरे हाथ से जिंदगी को पकडे हुआ था..
अब और चार कदम आगे और दीपन मेरी नजरोंसे पार.. क्या करू.. पूरी जान लगाके चिल्लाया दीssssपssन .. और उसने मेरी तरफ देखा ..
अब मुझे बड़ी भूक लगी थी .. सोचता हु माँ ने बनाया सुबह का नाश्ता करना चाहिए था..

Thursday, July 30, 2009

बराक भाऊ सप्रेम नमस्कार ....


श्री बराकभाऊ ओबामा यांना पत्र
।।श्री रोडकामाय प्रसन्न।।
तीर्थस्वरूप आदरणीय श्री बराकभाऊ ओबामा
पांढरे घर, आम्रिका!
यांचे शेवेशी सादर प्रणाम!


तुम्हाला वाटंल, की कस्काय बुवा या माणसानं पत्र धाल्डं आपल्याला! सगळेच खुलासे एकच डाव नाही करता येत नं भाऊ! एक एक करतो, जरा दमानं घे. आता, हाओ मी खेडय़ातला माणूस. पण धाव्वी शिकेल हाये. धाव्वी, म्हणजी मॅट्रिक झाल्यावरबी मला ‘व्हाइट हाउस’ म्हाईत नाही का काय, आसं तुझ्या शेक्रेटरीले वाटंल (हे पत्र आधी तुझा शेक्रेटरी वाचंल आन मंग ते तुझ्यापत्तर येईल, यवढं साधं गणीत तं माहीतच आहे गडय़ा मला.); पण सांगाची गोष्ट म्हंजे- गेल्साली मी शिवशेनेत होतो आन् या साली राज-शेनेत एण्ट्री घेतली. राज-शेनेला आमी मन्शे म्हंतो, पण त्येच्या डिटेलमंदी आता जात नाही. आन् माज्या शेनेचं सांगतलं, कारण मन्शेत गेल्यावर आमी ‘व्हाइट हाउस’ला ‘पांढरं घर’ म्हणा लागलो. ह्य़ेच्यावरबी आधी चर्चा झाली. व्हाइट म्हंजी पांढरं, ह्य़ेला सगळे पैल्याछूटच राजी झाले. पण ‘हौस’ म्हंजी घर, का ‘हौस’ म्हंजी ‘एक हौस पुरवा म्हाराज, मला आना कोल्लापुरी साज’- आसली हौस, ह्य़ेच्यावर लय वाद झाला. मंग एका धाव्वी नापासनं ‘हौस’चं स्पेलिंग दाकवलं आन् त्येचा आर्थ घर आसाच होतो, हे प्रू केलं. लय भारी लोक हायेत आमच्या गावातले. आम्रिकेत सगळे गोरे लोकं राह्य़तेत नं? त्येन्ला आम्ही पांढरे म्हणतो. तं आमच्या गंग्या बोल्ला का, पांढऱ्या लोकायनं लय हौशेनं बांधल्यालं घर म्हंजी व्हाइट हाउस आसंल. तं, अशी मजा आली भाऊ! दुसरीबी एक मजा सांगतो. मी धाव्वी हाये हे आधी सांगतलंच हाये. तं धाव्वी आसून आमेरिका हा वर्ड आम्रिका आसा लेहिला, त्याचं आश्शर्य वाटलं आसंल ना? तं, त्याचं काय हाये, आमचा परभ्या जरा जास्त शिकेल आन् जरा जास्त हुशार हाय. त्यो म्हण्ला की तू- म्हंजी बराकभाऊ काळा हाये, तं आता आमेरिका हे नाव आफ्रिकासारकं आम्रिका लेहायले पाह्य़जे. भल्तीच बेस्ट वाटली आम्हाला ही आयडिया. तं, सागाची मेन गोष्ट तं राहूनच गेली. परवा आमचा केशा आम्रिकेतून वापस आला, त्येच्या संबंधीबी लेहायचं होतं. त्येची पण एक मजा सांगतो. केशा वापस आला आन् चौकात भेटला. म्हटलं, भाऊ, काऊन वापस आला रे आम्रिकेतून? तं म्हणे, ‘तिकडं मंदी आली म्हणून वापस आलो.’ म्हटलं त्याले, ‘‘काऊन खोटा बोलतं रे? देशमुखाची मंदी तं कालच पाह्य़ली म्या कालेजात जाताना, सायकलला पायडल मारत.’’ मंग केशानं समजाऊन देल्लं- मंदी म्हंजी आपली मंदी न्हाय. मंदी म्हंजी तुटवडा पल्डा. आपल्याकडे चार-आठ आण्याचा तुटवडा पल्डा की कन्डक्टर चाराने वापस द्याचे तं धा पैशाचं चाकलेट देतो आन् आपणबी ते तोंडात घालून गप ऱ्हातो. तं मदीचं सांगत होतो, केशा ‘आपली मंदी’ म्हणला तेव्हा खुशी वाटली होती. पण बराकभाऊ, खिशात मंदी आसंल तं मनात देशमुखाची मंदी आणून काय उपेग म्हणा! केशाच्याच घरी बसून टी. व्ही.वर तुमचा शपतीचा कारेक्रम पाह्य़ला. या कारेक्रमासाठी सात आरब खर्ची पडले, आसं टी. व्ही.वर सांग्ांतलं. तं, आधी मला वाटलं का, तिकडं त्या गाझापट्टीमधी आरब खर्ची पडत्येत नं, त्याची म्हाईती सांगते का काय टी. व्ही.वर! केशा म्हण्ला, ‘आता यवढय़ा चांगल्या कारेक्रमात तिकडल्या आरबायची आठोन कोण कशाला काढंल?’ मंग त्यानं सात आरब म्हंजी किती रुपये होतेतं, त्येचा हिशेब सांगतला.त्या ऐकून म्या हडबडलो गड्या .. अरे इतक्या पैशात आमच्या आख्या तालुक्याचे भले झाले असते न भाऊ .. पण जाऊदे तुझा पैसा हाय कसा खर्च करायचं ते तू ठरवणार म्हना.. तं मी म्हण्लो, ‘काय रे केशा, आम्रिकेत मंदी हाये आसं खोटंच सांगून पाठवलं की काय वापस तुला भारतात?’ परेशान तं झालाच केशा माझा सवाल आयकूनं, पण बोल्ला नाही तसा. तं, सांगाचा मुद्दा आसा की, केशाला वापस कामावर घिऊन टाक. तिकडं मंदी आली म्हणून तो इकडंबी मंदीच्या मागं मागं आसतो. केशा आम्रिकेत आसताना मी एक डाव मंदीच्या सायकलची चेन लावून देल्ली होती. तेव्हापासून ती हासती कधी कधी. केशा आपला मित्र हाय, त्याच्याशी मंदीवरुन उगा दुस्मनी नको. तं मेन पॉइंट आसा, की राज-शेनेचा मी या गावचा मुख्य हाये. आन् म्हणून तुम्ही (तू म्हणावं का तुम्ही, यात या पत्रात लय घोळ झाला बगा.) आम्रिकेचे मुख्य झाल्याचं अभिनंदन, म्हणून हे पत्र.

ता. क. (आसं पत्राच्या शेवटी लेहेतात बग)- तं लेहायचा एक पाइंट राहून गेला. आता जरुरीची कामं संपली की एक डाव भारतात ये बराक भाऊ! पण एक गोष्ट कर गडय़ा तू बराकभाऊ.. भारतात येशील तवा फक्त भारतातच ये, उगा जाता जाता पाकिस्तानलाबी नको जाऊ. न्हाई तं, देशमुखाची पोरगी पाहाला जाचं आन् जाता जाता पवारायची पोरगीबी पाहून टाकाची- आसं नको करू. बरं, संपवतो आता. पत्राला उत्तर दे आन् खर्च जरा जपून कर.
तुझाच,
रंगाने शेम असलेला मित्र.

Wednesday, July 1, 2009

सत्तर मिनिट.. शाहरुख़ खान ..चक दे इंडिया


सत्तर मिनिट सत्तर मिनिट है तुम्हारे पास| तुम्हारे जिंदगी के सबसे खास सत्तर मिनिट| इस सत्तर मिनिट में तुम हरो या जीतो लेकिन ये सत्तर मिनिट तुम्हे जिंदगी भर याद रहेंगे| तो कैसे खेलना है .. आज मै तुम्हे नहीं बताऊंगा |बस इतना कहूँगा के जाओ और ये सत्तर मिनिट जी भर कर खेलो क्योंकि इसके बाद आनेवाली जिंदगी में कुछ सही हो या न हो, चाहे कुछ रहे या न रहे, तुम हरो या जीतो लेकिन ये सत्तर मिनिट तुमसे कोई नहीं छीन सकता..कोई नहीं| तो मै सोचता हु के इस मैच में कैसे खेलना है ये मै तुम्हे नहीं बताऊंगा..बल्कि तुम मुझे बताओगे ..खेलकर | क्योंकि मै जनता हु की ये सत्तर मिनिट इस टीम का हर एक प्लेयर अगर अपनी जिंदगी की सबसे बढ़िया हॉकी खेलेगा तो ये सत्तर मिनिट खुदा तुमसे वापस नहीं मांग सकता| तो जाओ और अपनी जिंदगी से,अपने आप से , अपने खुदा से और हर उस शख्स से जिसने तुमपर भरोसा नहीं किया छीन लो ये सत्तर मिनिट..जाओ |